शांति तब नहीं आती जब संसार शांत हो,
बल्कि जब भीतर का संघर्ष समाप्त हो।
हम अक्सर सोचते हैं कि
परिस्थितियाँ ठीक हो जाएँगी,
लोग हमारे अनुसार व्यवहार करने लगेंगे
और समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी,
तब हमें शांति मिलेगी।
लेकिन संसार का स्वभाव परिवर्तन है।
यहाँ हर परिस्थिति हमेशा
हमारे अनुसार नहीं रह सकती।
अशांति केवल बाहर की घटनाओं से नहीं,
उनके प्रति हमारे विरोध, अपेक्षा
और पकड़ से भी पैदा होती है।
मन बार बार कहता है,
“ऐसा नहीं होना चाहिए था”
या “सब कुछ मेरे अनुसार होना चाहिए।”
यही भीतर का संघर्ष हमें थका देता है।
वेदांत हमें परिस्थितियों से भागना नहीं,
उन्हें स्पष्टता और विवेक से देखना सिखाता है।
जब स्वीकार का अर्थ हार मानना नहीं,
बल्कि वास्तविकता को वैसा देखना हो जैसी वह है,
तब भीतर का अनावश्यक संघर्ष कम होने लगता है।
संसार का शांत होना हमारे हाथ में नहीं,
लेकिन भीतर शांति को पहचानना संभव है।
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