4/17/2026

quotes 1

ओशो


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          इस पृथ्वी पर जब भी आंखें प्रेम या आनंद के आंसुओं से भर जाती हैं, तब पृथ्वी के वासी नहीं रह जाते; क्षणभर को तुम किसी और लोक में प्रवेश कर जाते हो। यद्यपि क्षणभर के लिए ही होता है यह, मगर क्षणभर भी क्या कम है! और क्षण भी ऐसे शाश्वत का ही अंग है। थोड़े पर फड़फड़ाए पक्षी ने, तो भी आकाश में थोड़ा तो उठा! इतना उठा है तो और भी उठेगा। लेकिन इन आंसुओं की निंदा मत करना। क्योंकि जिसकी भी हम निंदा करते हैं, वही अवरुद्ध हो जाता है। इनका स्वागत करो।

            बैठे-बिठाए बज्म में 
            कल रात रो पड़े
            बस याद आ गयी थी 
            कोई बात रो पड़े

            सुनते हो मुझे, कोई भूली-बिसरी याद आ जाती होगी। शायद जन्मों-जन्मों से विस्मृति का परद पड़ा हो, लेकिन मूलतः तो हम आते परमात्मा से हैं। वही हमारा निवास है, मूल उद्गम है, स्रोत है। याद तो कहीं पड़ी है; जब मैं तुम्हें पुकारता हूं, उसी याद पर चोट पड़ जाती होगी। रोओ, जी भरकर रोओ! इसमें कृपणता भी न करना। आंसू जितने बहें उतना शुभ है। आंखें उतनी स्वच्छ हो जाएंगी- और बाहर की ही आंखें नहीं, भीतर की आंखें भी। आंसू दोनों को स्वच्छ करते हैं, अगर अंतर से आएं। और अंतर से ही आते हैं, क्योंकि तुम्हारे लाए नहीं आते। मुझे सुनते हो तब आ जाते हैं। मुझे सुनकर किसी रौ में बह जाते होओगे। कोई तरंग जगने लगती होगी। मेरी आवाज तुम्हारे भीतर सोई हुई आवाज को जगाने लगती होगी। ज्योति से ज्योति जले! इस अंधेरी दुनिया में इन आंसुओं के साथ बड़ी आशा जुड़ी है।

            आस की बस्ती में इक 
            छोटी-सी उम्मीदे-विसाल
            अजनबी की तरह से  
            फिरती है घबराई हुई

             यह तो अंधेरे की बस्ती है और निराशा की। यहां बाहर तो कुछ भी मिलने को नहीं है। यहां तो सिर्फ एक ही बात अंकुरित हो जाए हृदय में "उम्मीदे-विसाल', परमात्मा से मिलने की आकांक्षा जग जाए तो समझना कि जीवन सार्थक हुआ। बाजार में हंसे भी तो व्यर्थ; मंदिर में रोए भी तो सार्थक। व्यर्थ के साथ प्रसन्न भी दिखाई पड़े, तो व्यर्थ; सार्थक के साथ गमगीन भी हो गए, उदास भी हो गए, आंसुओं से भी भर गए, तो भी सार्थक।
           आंसू बड़ी संपदा हैं। अगर ठीक मार्ग पर पड़ें, तो यही बीज हैं। इन्हीं से फूल भी खिलेंगे। इन्हीं आंसुओं का अंतिम परिणाम वे कमल हैं, जिनकी फकीरों ने सदा बात की है -हजार पंखुड़ीवाले कमल! उनके ही ये बीज हैं। रोना कठिन तो मालूम होता ही है, अड़चन तो मालूम होती ही है। और फिर, हमारे मनों में आंसुओं का संबंध अनिवार्य रूप से दुःख से हो गया है। इस दुनिया में तो हमारी हंसी तक दुःख से जुड़ी है। आंसुओं का तो कहना ही क्या, हमारा हंसना भी दुःख से जुड़ा है। इस दुनिया में सभी कुछ दुःख है। यहां हमने दुःख ही जाना है। रोए हम तभी, जब पीड़ित हुए हैं। इसलिए आंसुओं की एक और भाव-भंगिमा है जिससे हम अपरिचित रह जाते हैं। आनंद के भी आंसू होते हैं। आंसुओं का कोई अनिवार्य संबंध दुःख से नहीं है। आंसुओं का अनिवार्य संबंध तो किसी भी भाव-दशा से है, जो तुम्हारे भीतर इतनी सघन हो जाए कि तुम उसे संभाल न पाओ।
            जैसे मेघ भरे हुए आएं और बरस जाएं, झलक जाएं, छलक जाएं।ऐसे जब तुम्हारे भीतर का घड़ा बहुत भरा होता है -फिर चाहे दुःख से भरा हो, चाहे आनंद से, चाहे प्रीति से, चाहे प्रार्थना से- आंसू झलकेंगे। आंसू तो खबर लाते हैं कि कोई चीज बहुत गहन होकर भरी है -इतनी कि अब तुम संभाल न पाओगे। मुझे सुनते हो, कोई भूली-बिसरी याद जगती है। कोई स्वप्न जो तुम्हारे भीतर पड़ा है, रूप लेने लगता है। निराकार की थोड़ी-सी झलक आने लगती है। मैं तुमसे जो बोल रहा हूं, वे अगर शब्द ही होते तो ऐसा नहीं हो सकता था। शब्दों के साथ मैं भी हूं~ओशो