1925 में भौतिक विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हम ईश्वर के बारे में कुछ नहीं जानते, लेकिन एक बात निश्चित है: पदार्थ मृत है। आपके चारों ओर कोई ठोस भौतिक वस्तु नहीं है — सब कुछ केवल कंपनों (वाइब्रेशन्स) का खेल है।
ये परस्पर काटती-छाँटती तरंगें पदार्थ का भ्रम पैदा करती हैं।
यह उसी तरह है जैसे आप एक फ़िल्म देखते हैं: परदे पर वास्तव में कुछ नहीं होता — केवल विद्युत प्रकाश की क्रिसक्रॉस धाराएँ, और वही पूरा भ्रम रचती हैं।
और अब तो त्रि-आयामी (3D) फ़िल्में भी हैं, जो पूर्णतः त्रि-आयामी उपस्थिति का भ्रम पैदा कर देती हैं।
ठीक इसी प्रकार यह पूरा संसार है — एक विद्युत घटना (electric phenomenon)।
केवल आप वास्तविक हैं; साक्षी ही वास्तविक है। बाकी सब कुछ एक स्वप्न है।
और बुद्धत्व का अर्थ है — जब आप इन सभी स्वप्नों का अतिक्रमण कर जाते हैं, और देखने के लिए कुछ नहीं बचता — केवल देखने वाला (The Seer) मौन बैठा रहता है।
न कोई वस्तु शेष, न कोई दृश्य — केवल साक्षी का शुद्ध अस्तित्व।
तभी आप बुद्धत्व को, वास्तविकता को प्राप्त होते हैं।
— ओशो
Tantra: The Supreme Understanding
अध्याय 7: The Pathless Path
बुद्धा हॉल प्रवचन



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