11/15/2017

Osho

प्रेमपूर्ण चित्त की अवस्था मे सर्वत्र परमात्मा ही दिखाई पड़ता है, प्रेम परमात्मा की ही अनुभूति है, प्रेमपूर्ण चित्त ही परमात्मा की अनुभूति कर सकता है। जिससे भी प्रेम होगा, उसी मे परमात्मा की छवि दिखाई पड़ेगी। प्रेम पात्र परमात्मा ही दिखाई पड़ेगा। यदि ऐसा नही है, तो फिर प्रेम है ही नही, प्रेम की भ्रांति है।

विरह

विरह क्या है?

      भक्ति के मार्ग पर विरह आधी यात्रा है, और मिलन शेष आधी। दो ही कदम हैं भक्ति कें—विरह और मिलन। पहले विरह, फिर मिलन। जो विरही है, वही मिलेगा। विरह का अर्थ है कि मुझे पता नहीं कि मैं कौन हूं। विरह का अर्थ है कि मुझे पता नहीं परमात्मा कहां है, कहा छिपा है। विरह का अर्थ है कि मुझे मेरे जीवन का अर्थ नहीं मिलता। विरह का अर्थ है, आंसू और आंसू मेरी आत्मा पर फैले हैं, मैं रो रहा हूं? मैं पुकार रहा हूं; राह नहीं सूझती, अंधेरा है, मैं टटोल रहा हूं; मैं भटक रहा हूं; मैं गिर रहा हूं; मैं उठ रहा हूं। विरह प्यास है। विरह अभीप्सा है। कुछ है जो प्रकट नहीं हो रहा है, और जो प्रकट हो जाए तो जीवन का अर्थ मिल जाए, जीवन में संगति आ जाए। संगीत आ जाए। कुछ है जो अनुभव में आता है भीतर कि पास ही है, फिर भी चूक—चूक जाता है। कुछ है जिसकी अचेतन में ध्वनि सुनाई पड़ती है, लेकिन चेतन तक नहीं आ पाती।
      विरह का अर्थ है, परमात्मा है और मुझे नहीं मिल पा रहा है। तो मैं रोऊं, तो मैं पुकारूं, तो मैं गिरूं उसके अतात चरणों में, तो मैं उस अज्ञात के लिए दीए जलाऊ, आरती सजाऊं, फूलमालाएं गूथूं; मैं खाली हूं और मेहमान आ नहीं रहा है—मेहमान है निश्चित, इसकी प्रतीति होनी शुरू होती है भक्त को कि परमात्मा है निश्चित, हर तरफ उसकी छाया सरकती मालूम पड़ती है, फूलों मे उसका रूप दिखाई पड़ता है, पक्षियों में उसकी उड़ान मालूम होती है, झरनों में उसका कलकल नाद मालूम होता है, अस्पष्ट सी अनुभूति होती है, पगध्वनि सुनाई पड़ती है कभी—कभी किन्हीं क्षणों में और किसी—किसी झरोखे से वह झांक जाता है, किसी सपने में उसकी छाया पड़ती है, प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है—दूर की—एहसास होने लगता है कि है तो जरूर, लेकिन कब छाती से छाती मिले, कब आलिंगन हो!
      विरह का अर्थ है, ऐसी चित्त की दशा जिसे एहसास तो होना शुरू हुआ, लेकिन एहसास अभी अनुभूति नहीं बना है। जिसे परमात्मा की प्रतीति अनुभव में तो आने लगी, लेकिन आमना—सामना नहीं हुआ, दरस—परस नहीं हुआ है। ध्वनि सुनी है कहीं से, लेकिन कहा से आती है, स्रोत नहीं मिल रहा है। ध्वनि सुनकर ही भक्त मस्त हो गया है। जैसे मदारी ने अपनी तुरही बजाई हो और सांप अपनी पोल में छिपा हुआ तड़फने लगे, ऐसा विरह है। सरकने लगे ध्वनि के स्रोत की तरफ, मस्त होने लगे, मदमस्त होने लगे।
      इस विरह को शांडिल्य ने कहा—बड़ा उपयोगी है। जब दो विरही मिल जाते हैं, रोते हैं और एक—दूसरे को रुलाते हैं और प्रभु की महिमा बखान करते हैं, प्रभु की उपस्थिति की चर्चा करते है, प्रभु की झलकें एक—दूसरे से आदान—प्रदान करते हैं, तब सत्संग होता है। उसी सत्संग में धीरे— धीरे अनुभव निखरते हैं, साफ होते हैं। सोना विरह की अग्नि से गुजर—गुजरकर खालिस कुंदन बनता है। और एक दफा मजा आने लगता है आसुओ का—क्योकि ये आंसू परमात्मा के लिए हैं, ये दुख के आंसू नहीं हैं, ये बड़े अहोभाव के आंसू है; इतना भी क्या कम है कि हमें उसका एहसास होने लगा, हम धन्यभागी हैं कि हमें उसका एहसास होने लगा, अभागे है बहुत जिन्हें यह पता ही नहीं है कि परमात्मा जैसी कोई बात होती है, जिन्होंने कभी इस शब्द पर दो क्षण विचार नहीं किया है, जिन्हें प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं मालूम।
आओ फिर नज्म कहें
      फिर किसी दर्द को सहला के सुजा लें आखें
      फिर किसी दुखती हुई रग से छुआ दें नश्तर
      या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर इक बार
      नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज ही दे लें
      फिर कोई नज्म कहें
      आओ फिर कोई नज्म कहें
      जब दो विरही मिलते हैं—और विरहियो का मिलन सत्संग है। जब दो प्रेमी मिल जाते हैं, या चार प्रेमी मिल बैठते हैं, तो करते क्या हैं? रोते हैं और रुलाते हैं। रोमाचित होते हैं, एक दूसरे की भावदशा को पीते हैं, एक दूसरे की भावदशा से आदोलित होते हैं, एक—दूसरे से संक्रामित होते हैं।
      आओ फिर नज्म कहें
      फिर किसी दर्द को सहला के सुजा ले आखें
      फिर किसी दुखती हुई रग से छुआ दें नश्तर
      या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर इक बार
      नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज ही दे लें
      फिर कोई नज्म कहें
      इन घड़ियों में परमात्मा और थोड़े करीब आ जाता है। जितने तुम्हारे आंसू गहन होते हैं, उतना परमात्मा करीब आ जाता है—आंसू भरी आखें ही उसे देखने में समर्थ हो पाती हैं। आंसू से भरी आखें पात्र हो जाती हैं। लबालब। आंसू से भरी आखें तुम्हारी प्रार्थना से भरी आखें हैं, झलक उसकी गहराने लगती है। जितनी झलक गहराती है, उतनी तडूफ भी गहराने लगती है।
      मगर निठुर न तुम रुके, मगर निठुर न तुम रुके
      पुकारता रहा हृदय, पुकारते रहे नयन
      पुकारती रही सुहाग—दीप की किरन—किरन
      निशा—दिशा, मिलन विरह विदग्ध टेरते रहे
      कराहती रही सलज्ज सेज की शिकन—शिकन
      असंख्य श्वास बन समीर पथ बुहारते रहे
      मगर निठुर न तुम रुके, मगर निठुर न तुम रुके
      आता परमात्मा बहुत बार और चला जाता। आया हवा के झोंके सें—यह आया और यह गया! और पीछे बड़ा विदग्ध भाव छोड़ जाता। विरह घना होने लगता है। विरह एक ऐसी घड़ी में आ जाता है, जब विरह भक्त की मृत्यु बन जाता है, जब भक्त अपने को बिलकुल ही गंवा देता है, जब विरही और विरह दो नहीं रह जाते, जब विरही और विरह एक ही हो जाते हैं, जब भक्त का रोआ—रोआ रोता है, श्वास—श्वास रोती है, धड़कन— धड़कन रोती है, उसी घड़ी क्रांति घटती है, उसी घड़ी विरह की रात्रि पूरी हुई, मिलन की सुबह आई।
      विरह को सग़ैभाग्य समझना। विरह द्वार पर दस्तक दे, टालना मत। विरह पुकारे, उसके पीछे जाना। विरह बहुत सताएगा, क्योंकि सताए बिना निखार नहीं है। विरह बहुत जलाएगा, क्योंकि बिना जलाए कोई परिशुद्धि नहीं है। विरह को मित्र मानना, तो एक दिन विरह तुम्हें इस योग्य बना देगा कि मिलन घट सके।
      विरह तुम्हारे हाथ में है, मिलन तुम्हारे हाथ में नहीं। इसलिए विरह को जितना प्रगाढ़ कर सको उतना प्रगाढ़ करो। रोओ, रोमांचित होओ, नाचो, पुकारों। यही पुकार यही रुदन, यही
रुदन, यही नृत्य, यही तुम्हारे हृदय से उठती हुई कराह तुम्हें धीरे—धीरे परमात्मा की तरफ खींचती ले जाएगी। यही तुम्हें ठीक दिशा देगी, और इसी दिशा से एक दिन परमात्मा चला आता है। जिस दिन तुम्हारा विरह सचमुच परिपूर्ण हो जाता है, उस दिन तुम परमात्मा को पाने के हकदार हो गए, उस दिन तुम पात्र बने।
      संन्यास के लिए पात्रता की जरूरत नहीं है, परमात्मा के लिए पात्रता की जरूरत आएगी। लेकिन वह पात्रता भी ध्यान रखना, तुम्हारे उपवास की पात्रता नहीं है, और न तुम्हारे त्याग की पात्रता है, क्योंकि उससे तो अहंकार भरता है।
      वह पात्रता तुम्हारे आसुओ की पात्रता है, क्योंकि आसुओ से ही तुम गलते हो, पिघलते हो; आसुओ में ही एक दिन धीरे—धीरे गल—गलकर अहंकार समाप्त हो जाता है।
      जहां अहंकार की समाप्ति है, वहीं परमात्मा से मिलन है।
अथातो भक्ति जिज्ञासा , ओशो

11/12/2017

Why Spiritual Awakening Breaks Your Relationships?




Why Spiritual Awakening Breaks Your Relationships?
We all have had difficulties at the beginning of our spiritual path, we all have felt misunderstood and sometime feeling lost in our thoughts, at these state our relationship with people for some reasons  gets complicated, lets see why…


When you are going through spiritual awaking you are going towards truth, to a higher level of awareness that others haven’t experience yet. When you try to go back  and try to rebuilt you relationship with people, not necessary  a partner but in general , it won`t work, these people have not experienced what you have experienced.

Spiritual awakening experiences most of time are painful. If you are open to deal with the darkest parts within yourself, within humanity and you have the strength to be able to handle this kind of energy deep inside you. Even when you may break down or you are passing through low period this is exactly what is required from you in order to go through it. If you have been through spiritual awaking you have this within you, you are stronger than most.

Some people are not able to see that there are other things out there, other ways to see life. But you feel it that something with this standard of life isn’t working and things must change. When you go through spiritual awaking these becomes obvious and you can feel it in your soul that this is painful and this painful process in your life must be gone through, but people block it, consciously or unconsciously  by denying it because they are not ready. So relationships start being difficulty because you are so aware of things and your partner isn`t going to understand anything of it.

Spiritual awakening it’s a healing process , healing your emotions, healing your own body, physical body and spiritual body. This process requires time, alone time. And when you try to fit in your regular relationship things go wrong because you are not at the same frequency level any more. You can  not have this type of relationship until you are fully healed in to you one body, your one mind, your one spirit, and you can not heal yourself when you are in those relationship because the emotions will mess you up and you will blame the other.


You have to know what twin flames are. Our planet isn’t ready yet to understand what those higher vibration relationships are the one which are going to really change our planet and shift us from current relationships that we are experiencing ( neediest, arguing, victims) all this weird things that we don’t really need to experience.
If you are experiencing these in your relationships and let them go, you are healing, you just need to have faith and love for yourself. Don’t get so hurt for your relationship, why aren’t they working anymore just open yourself to these energy and it`s a lot easier to go through, the pain will leave a lot more quickly.
source https://dailyoccupation.com/2017/04/24/spiritual-awakening-breaks-relationships/

10/22/2017

Osho meaning

********** ओशो शब्द का क्या अर्थ है **********
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ओशो ने अपने जीवनकाल के अंतिम क्षणों में यह शब्द अपने लिए, नाम के रूप में चुना |
यह शब्द अंग्रेजी के एक कवि William James की कविता ‘ओशनिक एक्सपेरिएंस ‘ से लिया गया है | ओशनिक एक्सपेरिंस यानि सागरीय अनुभव, समुन्द्र जैसे विराट होने का अनुभव | जब कोइ बूँद सागर में मिल जाती है तो वह स्वयं ही सागर स्वरुप हो जाती है, अलग नहीं बचती | ऐसे ही जब हमारी जीवात्मा परमात्मा के साथ, विराट ब्रह्म के साथ लौ-लीन होकर एक हो जाती है | तब आत्मा नहीं बचती है बस परमात्मा ही बचता है | बूँद सामप्त, केवल सागर शेष | ऐसा ओशनिक एक्सपेरिएंस, सागरीय अनुभव जिसे हुआ उसे’ ओशो कहते हैं | ओशो ने एक नया शब्द गड़ा अपने लिए | यह इस बात का प्रतिक है की ‘ओशो’ किसी पुरानी परंपरा, किसी रूढ़ि के हिस्से नहीं है | वे एक नई परंपरा की शुरुआत है | इस नए शब्द के संग एक नई परंपरा शुरू होती है |
कबीर साहब के शब्दों में इस बात को समझें तो आसानी होगी | आपने सुना होगा कबीर साहब का यह प्रीतिकर वचन –
हेरत हेरत हे सखी, रम्हा कबीर हिराय |
बूँद सामान्य समुन्द में, सो कत हेरी जाय ||
वे कहते हैं, खोजते-खोजते कबीर स्वयं खो गया | जैसे बूँद सागर में गिरी अब कहाँ बूँद मिलेगी ? कौन बूँद, कहाँ की बूँद ! सागर ही बचा बूँद खो गई | बूँद सामान्य समुन्द में सो कत हेरी जाय | अब कहाँ बूँद को खोजे ? उसकी कोई identity नहीं बची | तो ‘ओशो’ शब्द का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति जो विराट ब्रह्म के साथ एकाकार हो गया | उपनिषद में एक अति-महत्वपूर्ण वाक्य है की ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म हो जाता है ...

10/17/2017

सुफी गीत

#sufi #spirituality

अगर है शौक मिलने का, तो हरदम लौ लगाता जा,
जलाकर ख़ुदनुमाई को, भसम तन पर लगाता जा।

पकड़कर इश्क की झाड़ू, सफा कर हिज्र-ए-दिल को,
दुई की धूल को लेकर, मुसल्ले पर उड़ाता जा।

मुसल्ला छोड़, तसवी तोड़, किताबें डाल पानी में,
पकड़ तू दस्त फरिश्तों का, गुलाम उनका कहाता जा।

न मर भूखा, न रख रोज़ा, न जा मस्जिद, न कर सज्दा,
वजू का  तोड़  दे  कूजा, शराबे  शौक  पीता  जा।

हमेशा खा, हमेशा पी, न गफलत से रहो एकदम
नशे में सैर कर अपनी, ख़ुदी को तू जलाता जा।

न हो मुल्ला, न हो बह्मन, दुई की छोड़कर पूजा,
हुकुम शाहे कलंदर का, अनल हक तू कहाता जा।

कहे ‘मंसूर‘ मस्ताना, ये मैंने दिल में पहचाना,
वही मस्तों का मयख़ाना, उसी के बीच आता जा।

https://youtu.be/Wt0E8dDhtIQ

10/08/2017

Awareness during sleep

AWARENESS DURING SLEEP

Q: How can sadhana become uninterrupted since it is necessary to sleep?

Anandamayi Ma: When one becomes established in ceaseless practice it continues also during sleep.

Question: How can one know this?

Ma: If one meditates before retiring and wakes up in the same kind of state with which one fell asleep one can presume that it has gone on throughout the sleep.

Question: But during sleep, one does not know.

Ma: No, not in this case. Although there is a much higher state when one is conscious even in sleep.

- Death Must Die, p. 521

8/30/2017

Quotes

We must realize that whatsoever the situation is, whatsoever the case is with you, you are responsible, no one else.

If you are responsible, then something is possible. If someone else is responsible, then nothing is possible. This is a basic conflict between the religious mind and the non-religious mind. The nonreligious mind always thinks that something else is responsible. Change the society, change the circumstances, change economic conditions, change the political situation, change something, and everything will be okay.

We have changed everything so many times, and nothing is okay. The religious mind says that whatsoever the situation, if this is your mind, then you will be in hell, you will be in misery. You won't be able to attain silence.

Put the responsibility on yourself. Be responsible, because then something can be done. You can only do something with yourself. You cannot change anyone in this world: you can only change yourself. That is the only revolution possible.

The only transformation possible is one's own, but that can be considered only when we feel that we are responsible.

~ Osho

...from: The Ultimate Alchemy Volume 2, Chapter 12, "Silence is the Prayer"