7/22/2017
7/21/2017
Emptiness
For those who have this urge inside them to fully awaken to what I am pointing to
I give you some clues, some tips:
Give up the concept that you have any rights in life or don´t even touch the idea of future- because all these things make you weak.
When you don´t have rights you see everything as a gift. When you drop the notion of future you are in real time with the universe again.
Give up the need to belong and to be accepted and you will be a friend to the whole world.
Give up self-definition and you´ll fit in everywhere.
Give up the idea that you can know someone: you cannot know anyone.
Give up the idea that you can know anything and you will find the universal consciousness.
Give up the idea that you are your body and you will be the inperishable Self.
But don´t tell anybody about it.
Fall in love with emptiness.
Fall in love with love but don´t be a love-story.
Then the experience of your existence will be like feeling that you are space moving about in space.
Tremendous love will be with you and unshakable peace, unfading happiness.
Mooji
7/20/2017
Guru
The Guru
Mr. Evans-Wentz continued another day: "May one have more than one spiritual master?"
M.: Who is a Master? He is the Self after all. According to the stages of the development of the mind the Self manifests as the Master externally. The famous ancient saint Avadhuta said that he had more than 24 Masters. The Master is one from whom one learns anything. The Guru may be sometimes inanimate also, as in the case of Avadhuta. God, Guru and the Self are identical.
A spiritual-minded man thinks that God is all-pervading and takes God for his Guru. Later, God brings him in contact with a personal Guru and the man recognises him as all in all. Lastly the same man is made by the grace of the Master to feel that his Self is the Reality and nothing else. Thus he finds that the Self is the Master.
D.: Does Sri Bhagavan initiate his disciples?
Maharshi kept silent.
Thereafter one of the devotees took it upon himself to answer, saying, "Maharshi does not see anyone as outside his Self. So there are no disciples for him. His Grace is all-pervading and He communicates his Grace to any deserving individual in silence."
source: Talk 23
Osho
तीसरा प्रश्न :
ओशो! आप ही मेरे सब कुछ हो। आपके रंग में पूरी तरह डूब गयी हूं। मेरा यह समर्पण पूरा है या अधूरा, मैं कुछ नहीं जानती। फिर भी मैं जैसी हूं, आनंदित हूं। आपके पहले मेरा न किसी संत से मिलना हुआ, न आगे किसी से मिलने की इच्छा है। फिर भी शायद आगे किसी तथाकथित साधु से मिलना हो जाए कि जो चमत्कार, जादू-टोना करनेवाला हो, तो क्या उसके सम्मोहन का मुझ पर असर हो जाएगा? कृपया बताने की अनुकंपा करें।
शांता भारती! जिस पर मेरा सम्मोहन चल गया, फिर उस पर किसी का सम्मोहन नहीं चलता है। उसकी तू चिंता छोड़। आखिरी बात हो ही गई। अब कहां जादू-टोना!
क्या आशा अभिलाषा, बन्दे अब यह रोना-धोना क्या?
दृष्टि लग गई जब कि नियति की, तब जादू और टोना क्या?
इतना तो हो चुका अभी तक, अरे और अब होना क्या?
अपने ही को जब कि खो चुके तब आगे अब खोना क्या?
नंग नहाये ताल तलैया धोना और निचोना क्या?
जब यों बे-घर-बार हुए तब बाती दीप संजोना क्या?
जब आकाश बन गया चंदुवा तब छप्पर में सोना क्या?
जब संग्रह का विग्रह छूटा तब अब स्वर्ग खिलौना क्या?
हलके हो कर तुम निकले हो फिर यह बोझा ढोना क्या?
कथरी छोड़ी कासा छोड़ा, गठरी और बिछौना क्या?
तुमने कब दुकान लगायी तब डयौढ़ा औ पौना क्या?
मस्त रहो, ओ रमते जोगी लुटिया आज डुबौना क्या?
अब फिकर छोड़ो। अब कोई जादू-टोना कुछ कर सकेगा नहीं। अब तो डूब ही गये। अब और कोई क्या डुबायेगा? अब बचे नहीं। अब कोई और क्या मिटायेगा? नहीं, अब कोई चिंता नहीं है।
और, तू सौभाग्यशाली है शांता, कि सीधे ही सागर के पास आ गयी! छोटी तालत्तलैयों में न उलझी। और जिसने सागर देख लिया, अब तालत्तलैया कुछ भी न कर सकेंगे। जिसे मेरी बात रुच जाती है, उसे चिंता के बाहर हो जाना चाहिये। जादू चल गया।
अब तू यह भी चिंता मतकर कि पूर्ण समर्पण है या नहीं। एक बीज भी पड़ जाये समर्पण का, तो काफी है। एक बीज ही फिर वृक्ष हो जाता है। एक बीज से ही फिर बहुत बड़ा वृक्ष हो जाता है। वह बीज पड़ गया है। एक बूंद अमृत की काफी है। कोई पूरा सागर अमृत का थोड़े ही पीना पड़ता है। एक बूंद काफी है। और वह बूंद पड़ गई है। वह बूंद न पड़े, तो मुझसे संबंध ही नहीं जुड़ता।
मुझसे थोड़े-से ही लोगों का संबंध जुड़ सकता है। मुझसे संबंध जुड़ना ही अपने आप में एक बड़ी परीक्षा है, एक कसौटी है।
आदमी की उंगलियों में कल्पना जब दौड़ती है
पत्थरों में जान पड़ जाती है
मूर्तियां सप्राण हो कर जगमगाती हैं।
स्पर्श में संजीवनी है।
आदमी का स्पर्श उंगली से उतर कर
पत्थरों की मूर्तियों में वास करता है
मूर्तियां जीवित बनी रहतीं हजारों साल तक,
बस, यही लगता, किसी ने आज ही इनको छुआ है।
और इस कारण बहुत-सी वस्तुएं प्राचीन युग की
खुशनुमा हैं, मोहनी हैं।
क्योंकि वे हैं आज भी
गर्मी लिये उन उंगलियों की
था जिन्होंने एक दिन उनको छुआ आवेश में।
मैं जिसे छू रहा हूं, उसे आवेश में छू रहा हूं। मैं आविष्ट हूं। जो मेरे पास संन्यस्त हो रहा है वह भी आविष्ट हो रहा है। यह एक जादू के जगत में दीक्षा है। जो झुकेगा, अंजुली भरेगा। जरा-सा पी लेगा यह जल, फिर कभी उसकी प्यास न उठेगी।
जीसस एक सांझ एक कुएं पर रुके। कुएं पर भरती थी एक स्त्री जल। उन्होंने उस स्त्री से कहा : मुझे प्यास लगी है, मुझे थोड़ा पानी दोगी? उस स्त्री ने जीसस की तरफ देखा। वह स्त्री अत्यंत दीन-हीन स्त्री थी। छोटी जाति की स्त्री थी। उसने देखा कि जीसस छोटी जाति के नहीं हैं। उनके कपड़े-लत्ते, उनका ढंग, उनका चेहरा...। उसने कहा : क्षमा करें! राही, शायद तुम्हें पता नहीं कि मैं बहुत गरीब, दीन-हीन, छोटी जाति की स्त्री हूं। आपकी जाति के लोग मेरा छुआ पानी नहीं पीते।
जीसस ने कहा : तू फिकिर छोड़! तू मुझे पानी पिला। और, मैं भी तुझे पानी पिलाऊंगा।
उस स्त्री ने कहा : आप भी मुझे पानी पिलाएंगे! थोड़ी चौंकी। उसने कहा : न तो डोर है आपके पास, न आपके पास बाल्टी है। आप मुझे कैसे पानी पिलाएंगे? और आप मुझे पानी पिला सकते हैं तो फिर मुझसे क्यों पानी मांगते हैं?
जीसस ने कहा : तेरा पानी और, मेरा पानी और। तू मुझे पानी पिला। लेकिन, तेरा पानी ऐसा है कि घड़ी भर बाद फिर प्यास लग आएगी। मैं भी तुझे पानी पिलाऊंगा। लेकिन मेरा पानी ऐसा है कि फिर तुझे कभी प्यास न लगेगी।
और कहते हैं, उस स्त्री ने जीसस की आंखों में झांका और जीसस की हो गई। उन आंखों में पी लिया उसने जल। मिल गया उसे अमृत।
झांको मुझमें, संन्यास का इतना ही तो अर्थ है कि मेरे करीब आ सको, कि मैं अपनी आविष्ट अंगुलियों से तुम्हें छू सकूं, कि जो मुझे घटा है उसका थोड़ा संस्पर्श तुम्हें भी हो जाये, कि तुम्हारी वीणा को थोड़ा झंकार दूं। एक बार बज जाये राग तो फिर कभी कोई और राग न तो उसके ऊपर है, न कभी था, न हो सकता है।
सहज योग--(प्रवचन--17)
7/19/2017
Relax
Just sit there right now
Don’t do a thing
Just rest.
For your separation from God,
From love,
Is the hardest work
In this
World.
Let me bring you trays of food
And something
That you like to
Drink.
You can use my soft words
As a cushion
For your
Head.
~ Hafiz
Universal Awakening
Awakening life
When we are prevented from doing the things we so much like to do, we feel frustrated and may brood over these denials. But though we do not see it then, there is a very good reason.
When our dear ones are taken from us; when we are obliged to give up our homes for just one room; when there are so many calls on our time and thought that we have to lay aside our gifts -for painting, music or writing - there are very good reasons.
When some rough awakening shocks us out of our comfort and security, out of our tranquil days - and we have begun to re-make our own little world, there is good reason.
Most of us pass our lives away eating the husks of life. Within them, beneath the rind, is a sweeter fruit than ever we have tasted. How shall we find it unless the rind is peeled away by Wisdom greater than our own, by a Love whose ways are strange and bewildering to us, but knows very well what it is about.
Until the outer fails us, we may never have to seek for That which not only abides through all change, all disappointment, all sorrow, but takes us safely through these deep waters and teaches us as It does so.
Disappointments point to our attachments with unerring accuracy and they are also closely linked to our intimate sense of self-esteem which is why they are so hard to acknowledge and accept.
- Therese of Lisieux
दूसरों को प्रभावित करने में उत्सुक अहंकार है
क्या होगा मुझे --
दस हजार लोग प्रभावित हों कि दस करोड़ लोग प्रभावित हों ।
इससे क्या होगा ?
उनको प्रभावित करके मैं क्या पा लूंगा ।
अज्ञानियों की भीड़ को प्रभावित करने की इतनी उत्सुकता
अज्ञान की खबर देती है ।
राजनेता दूसरों को प्रभावित करने में उत्सुक होता है --
समझ में आता है ; लेकिन धार्मिक व्यक्ति क्यों दूसरों को
प्रभावित करने में उत्सुक होगा !
जब भी तुम दूसरों को प्रभावित करना चाहते हो ,
तब एक बात याद रखना कि तुम आत्मस्थ नहीं हो ।
दूसरे को प्रभावित करने का अर्थ है की तुम अहंकार-स्थित हो ।
अहंकार दूसरे के प्रभाव को भोजन की तरह उपलब्ध करता है ;
उसी पर वह जीता है ।
जितनी आंखें मुझे पहचान लें , उतना मेरा अहंकार बडा़ होता है ।
अगर सारी दुनिया मुझे पहचान ले ,
मेरा अहंकार सर्वोत्कृष्ट हो जाता है ।
कोई मुझे न पहचाने --- गांव से निकलूं , सड़क से गुजरूं ,
कोई देखे न , कोई रेकगनीशन नहीं , कोई प्रत्यभिज्ञा नहीं ;
किसी की आंख में झलक न आये ,
लगे ऐसा जैसा कि मैं हूं ही नहीं -- बस , वहां अहंकार को चोट है ।
अहंकार चाहता है कि दूसरे ध्यान दें ।
यह बडे़ मजे की बात है --- अहंकार ध्यान नहीं करना चाहता ;
दूसरे उस पर ध्यान करें .... ,
सारी दुनिया उसकी तरफ देखे , वह केंद्र हो जाए ।
धार्मिक व्यक्ति , दूसरा मेरी तरफ देखे , इसकी फिक्र नहीं करता ;
मैं अपनी तरफ देखूं --- क्योंकि अंततः वही मेरे साथ जाएगा ।
यह तो बच्चों की बात हुई ।
बच्चे खुश होते हैं कि दूसरे उनकी प्रशंसा करें ।
सर्टीफिकेट घर लेकर आते हैं तो नाचते-कूदते हैं ।
लेकिन बुढा़पे में भी तुम सर्टीफिकेट मांग रहे हो --
तब तुमने जिंदगी गंवा दी !
सिद्धि की आकांक्षा दूसरे को प्रभावित करने में है ।
धार्मिक व्यक्ति की वह आकांक्षा नहीं है ।
वही तो सांसारिक का स्वभाव है ।
यह सूत्र कहता है कि मोह-आवरण से युक्त योगी को सिद्धियां
तो फलित हो जाती हैं , लेकिन आत्मज्ञान नहीं होता ।
वह कितनी ही बडी़ सिद्धियों को पा ले -- उसके छूने से मुर्दा जिंदा
हो जाए , उसके स्पर्श से बीमारियां खो जाएं , वह पानी को
छू दे और औषधि हो जाए -- लेकिन उससे आत्मज्ञान का कोई
भी संबंध नहीं है । सच तो स्थिति उल्टी है कि जितना ही वह
व्यक्ति सिद्धियों से भरता जाता है , उतना ही आत्मज्ञान से दूर
होता जाता है ; क्योंकि जैसे-जैसे अहंकार भरता है ,
वैसे-वैसे आत्मा खाली होती है और जैसे-जैसे अहंकार खाली
होता है , वैसे-वैसे आत्मा भरती है ,
तुम दोनों को साथ-ही-साथ न भर पाओगे ।
दूसरे को प्रभावित करने की आकांक्षा छोड़ दो ,
अन्यथा योग भी भ्रष्ट हो जायेगा । तब तुम योग भी साधोगे तो
वह राजनीति होगी , धर्म नहीं ।
और राजनीति एक जाल है । फिर येन-केन-प्रकारेण आदमी दूसरे
को प्रभावित करना चाहता है ।
फिर सीधे और गलत रास्ते से भी प्रभावित करना चाहता है ।
लेकिन प्रभावित तुम करना ही इसलिए चाहते हो ,
क्योंकि तुम दूसरे का शोषण करना चाहते हो ।
मैंने सुना है , चुनाव हो रहे थे और एक संध्या तीन आदमी हवालात
में बंद किये गये । अंधेरा था --- तीनों ने अंधेरे में एक-दूसरे को
परिचय दिया । पहले व्यक्ति ने कहा , ' मैं हूं सरदार संतसिंह ।
मैं सरदार सिरफोड़सिंह के लिए काम कर रहा था । '
दूसरे ने कहा , ' गजब हो गया ! मैं हूं सरदार शैतानसिंह ।
मैं सरदार सिरफोड़सिंह के विरोध में काम कर रहा था । '
तीसरे आदमी ने कहा , ' वाहे गुरुजी की फतह !
वाहे गुरुजी का खालसा ! हद हो गयी !
मैं खुद हूं सरदार सिरफोड़सिंह । '
नेता , अनुयायी , पक्ष के , विपक्ष के -- सभी कारागृहों के योग्य हैं ।
वही उनकी ठीक जगह है , जहां उन्हें होना चाहिए ;
क्योंकि , पाप की शुरुआत वहां से होती है ,
जहां मैं दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करना चाहता हूं ।
क्योंकि अहंकार न शुभ जानता है , न अशुभ ;
अहंकार सिर्फ अपने को भरना जानता है । कैसे अपने को भरता
है , यह बात गौण है । अहंकार की एक ही आकांक्षा है कि
मैं अपने को भरूं और परिपुष्ट हो जाऊं ।
और , चूंकि अहंकार एक सूनापन है , सब उपाय करके भी भर
नहीं पाता , खाली ही रह जाता है ।
जैसे-जैसे उम्र हाथ से खोती है , वैसे-वैसे अहंकार पागल होने
लगता है ; क्योंकि अभी तक भर नहीं पाया ,
अभी तक यात्रा अधूरी है और समय बीता जा रहा है ।
इसलिए बूढे़ आदमी चिड़चिडे़ हो जाते हैं ।
वह चिड़चिड़ापन किसी और के लिए नहीं है ;
वह चिड़चिड़ापन अपने जीवन की असफलता के लिए है ।
जो भरना चाहते थे , वे भर नहीं पाये ।
और बूढे़ आदमी की चिड़चिड़ाहट और घनी हो जाती है ;
क्योंकि उसे लगता है कि जैसे-जैसे वह बूढ़ा हुआ है ,
वैसे-वैसे लोगों ने ध्यान देना बंद कर दिया है ;
बल्कि लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह कब समाप्त हो जाए ।
मुल्ला नसरुद्दीन सौ साल का हो गया था ।
मैंने उससे पूछा कि ' क्या तुम कुछ कारण बता सकते हो ,
नसरुद्दीन । परमात्मा ने तुम्हें इतनी लंबी उम्र क्यों दी ? '
तो उसने बिना कुछ झिझककर कहा ,
' संबंधियों के धैर्य की परीक्षा के लिए । '
सभी बूढ़े संबंधियों के धैर्य की परीक्षा कर रहे हैं ।
वे चौबीस घंटे देख रहे हैं कि ध्यान उनकी तरफ से हटता जा
रहा है । मौत तो उन्हें बाद में मिटायेगी ,
लोगों की पीठ उन्हें पहले ही मिटा देती है ।
उससे चिड़चिड़ापन पैदा होता है ।
सब की पीठ हो गयी , जिनके चेहरे थे ।
जो अपने थे , वे पराये हो गये । जो मित्र थे , वे शत्रु हो गये ।
जिन्होंने सहारे दिये थे , उन्होंने सहारे छीन लिये ।
सब ध्यान हट गया ।
यह आदमी तो वही है जो कल था ; पद पर था -- वही आदमी अभी
भी है । सिर्फ अहंकार के शिखर पर था , अब खाई में है ;
आत्मा तो जहां-की-तहां है । काश ! इस आदमी को उसकी याद
आ जाए , जिसका न कोई शिखर होता , न कोई खाई होती ;
न कोई हार होती ; न जीत होती ; जिसको लोग देखें तो ठीक ,
न देखें तो ठीक ; जिसमें कोई फर्क नहीं पड़ता ; जो एकरस है ।
उस एकरसता का अनुभव तुम्हें तभी होगा ,
जब तुम लोगों का ध्यान मांगना बंद कर दोगे ।
भिखमंगापन बंद करो । सिद्धियों से क्या होगा ?
लोग तुम्हें चमत्कारी कहेंगे ।
लाखों की भीड़ इकट्ठी होगी ; लेकिन लाखों मूढो़ं को इकट्ठा करके क्या सिद्ध होता है कि तुम इन लाखों मूढो़ं के ध्यान के केन्द्र हो !
तुम महामूढ़ हो !
अज्ञानी से प्रशंसा पाकर भी क्या मिलेगा ?
जिसे खुद ज्ञान नहीं मिल सका , उसकी प्रशंसा मांगकर तुम
क्या करोगे ? जो खुद भटक रहा है , उसके तुम नेता हो जाओगे ?
उसके सम्मान का कितना मूल्य है ?
!! ओशो !!
शिव-सूत्र
पांचवा प्रवचन
संसार के सम्मोहन और सत्य का आलोक
दिनांक 15 सितंबर , 1974
प्रातःकाल , ओशो आश्रम , पूना
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