7/16/2017

जीवन साधना

|| जीवन साधना के  तीन सुत्र ||

पहला सूत्र है - वर्तमान में जीना।

लिविंग इन दि प्रेजेंट। अतीत और भविष्य के चिंतन की यांत्रिक धारा में इन दिनों न बहे। उसके कारण वर्तमान का जीवित क्षण, लिविंग मोमेंट व्यर्थ ही निकल जाता है जब कि केवल वही वास्तविक है। न अतीत की कोई सत्ता है, न भविष्य की। एक स्मृति में है, एक कल्पना में। वास्तविक और जीवित क्षण केवल वर्तमान है। सत्य को यदि जाना जा सकता है तो केवल वर्तमान में होकर ही जाना जा सकता है। साधना के इन दिनों में स्मरणपूर्वक अतीत और भविष्य से अपने को मुक्त रखें। समझें कि वे हैं ही नहीं। जो क्षण पास है-जिसमें आप हैं, बस वही है। उसमें और उसे परिपूर्णता से जी लेना है।

दूसरा सूत्र है - सहजता से जीना।

मनुष्य का सारा व्यवहार कृत्रिम और औपचारिक है। एक मिथ्या आवरण हम अपने पर सदा ओढ़े रहते हैं। और इस आवरण के कारण हमें अपनी वास्तविकता धीरे- धीरे विस्मृत ही हो जाती है। इस झूठी खाल को निकाल कर अलग रख देना है। नाटक करने नहीं, स्वयं को जानने और देखने हम यहां एकत्रित हुए हैं। नाटक के बाद नाटक के पात्र जैसे अपनी नाटकीय वेशभूषा को उतार कर रख देते हैं, ऐसे ही आप भी इन दिनों में अपने मिथ्या चेहरों को उतार कर रख दें। वह जो आप में मौलिक है और सहज है- उसे प्रकट होने दें और उसमें जीएं। सरल और सहज जीवन में ही साधना विकसित होती है।

तीसरा सूत्र है - अकेले जीना।

साधना का जीवन अत्यंत अकेलेपन में, एकाकीपन में जन्म पाता है। पर मनुष्य साधारणत: कभी भी अकेला नहीं होता है। वह सदा दूसरों से घिरा रहता है और बाहर भीड़ में न हो तो भीतर भीड़ में होता है। इस भीड़ को विसर्जित कर देना है। भीतर भीड़ को इकट्ठी न होने दें और बाहर भी ऐसे जीएं कि जैसे इस शिविर में आप अकेले ही हैं। किसी दूसरे से कोई संबंध नहीं रखना है।

संबंधों में हम उसे भूल गए हैं जो कि हम स्वयं हैं। आप किसी के मित्र हैं या कि शत्रु हैं, पिता हैं या कि पुत्र हैं, पति हैं या कि पत्नी है-ये संबंध आपको इतने घेरे हुए हैं कि आप स्वयं को अपनी निजता में नहीं जान पाते हैं। क्या आपने कभी कल्पना की है कि आप अपने संबंध से भिन्न कौन हैं?  क्या आपने अपने आप को अपने संबंधों के वस्त्रों से भिन्न करके भी कभी देखा है? सब संबंधों, रिलेशनशिप्स से अपने को ऋण कर लें। समझें कि आप अपने मां-बाप के पुत्र नहीं हैं, अपनी पत्नी के पति नहीं हैं, अपने बच्चों के पिता नहीं हैं, मित्रों के मित्र नहीं हैं, शत्रुओं के शत्रु नहीं हैं और तब जो शेष बच रहता है, जानें कि वही आपका वास्तविक होना है। वह शेष सत्ता ही अपने आप में आप, यू-इन योरसेल्फ हैं। उसमें ही हमें इन दिनों जीना है l

ओशो,
साधना पथ

ध्यान और भक्ती

महावीर और बुद्ध ईश्वर को स्वीकार नहीं करते। इसलिए नहीं कि नहीं जानते, मगर उनके लिए ईश्वर ध्यान के मार्ग से उपलब्ध हुआ है। ध्यान के मार्ग पर ईश्वर का नाम आत्मा है, स्वरूप है। और जिसने भक्ति से जाना है—मीरा ने या चैतन्य ने, जिन्होंने प्रेम के मार्ग से जाना है—उनके मार्ग पर अनुभूति तो वही है निर—अहंकारिता की, लेकिन अनुभूति को अभिव्यक्ति देने का शब्द अलग है। वे परमात्मा की बात करेंगे।

इन शब्दों से बड़ा विवाद पैदा हुआ है। मैं अपने संन्यासियों को चाहता हूं इस विवाद में मत पड़ना। सब विवाद अधार्मिक हैं। विवाद में शक्ति मत गंवाना। तुम्हें जो रुचिकर लगे—अगर ध्यान रुचिकर लगे ध्यान, अगर भक्ति रुचिकर लगे भक्ति। मुझे दोनों अंगीकार हैं। और कुछ लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें दोनों एक साथ रुचिकर लगेंगे; वे भी घबड़ाएं न।

बहुत से प्रश्न मेरे पास आते हैं कि हमें प्रार्थना भी अच्छी लगती है, ध्यान भी अच्छा लगता है! क्यां चुने? दोनों अच्छे लगते हों तो फिर तो कहना ही क्या! सोने में सुगंध। फिर तो तुम्हारे ऊपर ऐसा रस बरसेगा जैसा अकेले ध्यानी पर भी नहीं बरसता और अकेले भक्त पर भी नहीं बरसता। तुम्हारे भीतर तो दोनों फूल एक साथ खिलेंगे। तुम्हारे भीतर तो दोनों दीए एक साथ जलेंगे। तुम्हारी अनुभूति तो परम अनुभूति होगी।

मेरी चेष्टा यही है कि प्रेम और ध्यान संयुक्त हो जाएं और धीरे—धीरे अधिकतम लोग दोनों पंखों को फैलाएं और आकाश में उड़ें। जब पंख को फैलाकर लोग पहुंच गए सूरज तक, तो जिसके पास दोनों पंख होंगे उसका तो कहना ही क्या!

अमी झरत बिगसत कंवल, प्रवचन-२, ओशो

7/15/2017

Vivekanand

विवेकानंद तलाश करते थे

–गुरु की तलाश करते थे। और जिसे भी जानना हो उसे गुरु की तलाश ही करनी होगी। उस तलाश में वे बहुत लोगों के पास गये। रवींद्रनाथ के दादा के पास भी गये। उनकी बड़ी ख्याति थी। महर्षि देवेंद्रनाथ! महर्षि की तरह ख्याति थी। वे एक बजरे पर रहते थे। विवेकानंद आधी रात नदी में कूदे, तैरकर बजरे पर पहुंचे; सारा बजरा हिल गया। विवेकानंद चढ़े, जाकर दरवाजे को धक्का दिया। देवेंद्रनाथ रात अपने ध्यान में बैठे थे। इस पागल-से युवक को देखकर बड़े हैरान हुए। कहा: किसलिए आये हो युवक? क्या चाहते हो? यह कोई समय है आने का? विवेकानंद ने कहा कि समय और असमय का सवाल नहीं है। मैं यह जानना चाहता हूं: ईश्वर है?

यह बेवक्त आधी रात का समय, यह कोई पूछने की बात है! ऐसे कोई पूछने आता है! पूछा न ताछा, द्वार ठेलकर अंदर घुस आया युवक, पानी से भीगा हुआ, कपड़े पहने हुए तर-बतर।

एक क्षण देवेंद्रनाथ झिझक गये। उनका झिझकना था कि विवेकानंद वापिस कूद गये। उन्होंने कहा भी कि वापिस कैसे चले? तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो लेते जाओ। लेकिन विवेकानंद ने कहा: आपकी झिझक ने सब कह दिया। अभी आपको ही पता नहीं।

और यह बात सच थी। देवेंद्रनाथ ने लिखा है कि घाव कर गयी मेरे हृदय में। यह बात सच थी। मुझे भी अभी पता नहीं था, हालांकि मैं उत्तर देने को तत्पर था।

फिर यही विवेकानंद रामकृष्ण के पास गया और रामकृष्ण से भी यही पूछा: ईश्वर है? फर्क देखना, कितना फर्क है महर्षि देवेंद्रनाथ के उत्तर में और रामकृष्ण के उत्तर में। पूछा: ईश्वर है? रामकृष्ण ने एकदम गद्रन पकड़ ली विवेकानंद की और कहा कि जानना है, अभी जानना है, इसी समय जानेगा? यह विवेकानंद सोचकर न आये थे कि कोई ऐसा करेगा! कोई ईश्वर को जनाने के लिए ऐसी गर्दन पकड़ ले एकदम से और कहे कि अभी जानना है? इसी वक्त? तैयारी है?… खुद झिझक गये। कहां झिझका दिया था देवेंद्रनाथ को, अब झिझक गये खुद! और रामकृष्ण कहने लगे: ईश्वर को पूछने चला है, तो सोचकर नहीं आया कि जानना है कि नहीं? और इसके पहले कि विवेकानंद कुछ कहें, रामकृष्ण तो दीवाने आदमी थे, पागल थे, पैर लगा दिया विवेकानंद की छाती से और विवेकानंद बेहोश हो गये। तीन घंटे बाद जब होश में आये तो जो आदमी बेहोश हुआ था वह तो मिट गया था, दूसरा ही आदमी वापिस आया था। चरण पकड़ लिए रामकृष्ण के और कहा कि मैं तो झिझक रहा था, मैं तो उत्तर न दे सका, लेकिन आपने उत्तर दे दिया।

सदगुरु की तलाश! लेकिन पंडित सदगुरुओं के जैसे ही वचन बोलते हैं, उससे सावधान रहना। खोटे सिक्के बाजार में बहुत हैं। और खयाल रखना, खोटे सिक्कों की एक खूबी होती है, तुम अर्थशास्त्रियों से पूछ सकते हो। अर्थशास्त्री कहते हैं, खोटे सिक्के की एक खूबी होती है कि अगर तुम्हारी जेब में खोटा सिक्का पड़ा हो और असली सिक्का पड़ा हो तो पहले तुम खोटे को चलाते हो। खोटे सिक्के की खूबी होती है कि वह चलने को आतुर होता है। अकसर ऐसा होगा। तुम्हारी जेब में अगर दस का एक नकली नोट पड़ा है और एक असली, तो तुम पहले नकली चलाओगे न! जब तक नकली चल जाये, अच्छा। और जिसके पास भी नकली पहुंचेगा, वह भी पहले नकली ही चलायेगा। तो नकली सिक्के चलन में हो जाते हैं, असली सिक्के रुक जाते हैं। नकली सिक्के चलने के लिए आतुर होते हैं।

इस जगत में पंडित, मौलवी, पुरोहित खूब चलते हैं। सस्ते भी होते हैं, सुविधापूर्ण भी होते हैं, सांप्रदायिक भी होते हैं, भीड़ के अंग होते हैं, परंपरा के समर्थक होते हैं, रूढ़ि-अंधविश्वासों के हिमायती होते हैं, तुम्हारी जिंदगी में कोई क्रांति लाने की झंझट भी खड़ी नहीं करते, सिर्फ सांत्वना देते हैं; घाव हो तो एक फूल रख देते हैं घाव पर कि फूल दिखाई पड़े, घाव दिखायी पड़ना बंद हो जाये। इलाज तो नहीं करते। इलाज तो कैसे करेंगे? इलाज तो अपने घावों का भी अभी नहीं किया है।
ओशो

7/11/2017

Still mind

On a free day, just lie down somewhere outdoor and keep looking at the sky. A moment will come when the mind becomes still, there are no thoughts and you don't know where you are, but you know you are.
- Sri Sri Ravishankar

7/10/2017

Self realization

From ~~~ Maharshi’s Gospel, B.I, Ch.VI.

Q.:
Does my Realization help others?

M.: (Sri Ramana Maharshi)
Yes,
and it is the best help
that you can possibly render to others.

Those who have discovered great truths
have done so in the still depths of the Self.

But really there are no ‘others’ to be helped.

For,
the Realized Being sees only the Self,
just as the goldsmith sees only the gold
while valuing it in various jewels
made of gold.

When you identify yourself with the body,
name and form are there.
But when you transcend the body consciousness,
the ‘others’ also disappear.

The Realized one
does not see the world
as different from Himself.

Q.:
Would it not be better if the saints mix with others?

M.:
There are no ‘others’ to mix with.
The Self is the only Reality.

Q.:
Should I not try to help the suffering world?

M.:
The Power that created you
has created the world as well.
If it can take care of you,
it can similarly take care of the world also ....

if God has created the world,
it is His business to look after it,
not yours.

Q.:
Is it not our duty to be patriots?

M.:
Your duty is to be
and not to be this or that.

‘I AM THAT I AM’
sums up the whole truth;
the method is summarized in
‘be still’.

And what does stillness mean?
It means ‘destroy yourself ’;
because,
every name and form
is the cause of trouble.

‘I-I’ is the Self.
‘I am this’ is the ego.

When the ‘I’ is kept up
as the ‘I’ only,
it is the Self.

When it flies off
at a tangent and says
‘I am this or that,
I am such and such’,
it is the ego.

Q.:
Who then is God?

M:
The Self is God.
‘I AM’ is God.

If God be apart from the Self,
He must be a Selfless God,
which is absurd.

All that is required
to realize the Self is to be still.
What can be easier than that?

Hence
atma vidya (Self-knowledge)
is the easiest to attain.

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7/08/2017

Sri Guru Gita book

**** Happy Guru Purnima ****

॥ ॐ नमो भगवते श्रीरमणाय ॥
// Om Namo Bhagavate Sri Ramanaya //

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्
भावतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||

I prostrate myself before that Guru,
the Bliss of Brahman,
the bestower of Supreme Happiness,
who is Knowledge absolute,
transcending the pairs of opposites,
expansive like the sky,
the goal indicated by the great sayings like “Thou art That”,
the one eternal, pure, unchanging, the witness of functions of the intellect, who is above all Bhavas (mental conditions)
and the three Gunas (Sattva, Rajas and Tamas).

जो ब्रह्मानंदस्वरूप हैं, परम सुख देनेवाले हैं जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं,
(सुख, दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, भावना से परे हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणों से रहित हैं ऐसे श्री सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ |

***

यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च |
इत्थं विजानामि सदात्मरूपं त्स्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ||
अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः |
ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो ||

By whose grace that one realizes “I am everything,
everything is superimposed in me,
I offer my salutations and
worship to my self-realised Satguru’s lotus feet.

O Lord, by the gift of the light of knowledge, may Thy blessings be bestowed on me, whose eyes are covered by the cataracts of ignorance, and whose mind is captured by sense pleasure.

मैं ही सब हूँ, मुझमें ही सब कल्पित है, ऐसा ज्ञान जिनकी कृपा से हुआ है ऐसे आत्मस्वरूप श्री सद्गुरुदेव के चरणकमलों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ |

हे प्रभो ! अज्ञानरूपी अंधकार में अंध बने हुए और विषयों से आक्रान्त चित्तवाले मुझको ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करो |

~ From Sri Guru Gita book

Samadhi and Dhyana

Q: What is dhyana [meditation]?

Sri Ramana Maharshi :

It is abiding as one's Self without swerving in any way from one's real nature and without feeling that one is meditating.

Q: What is the difference between dhyana and samadhi?

Sri Ramana Maharshi :

Dhyana is achieved through deliberate mental effort.
In samadhi there is no such effort.

Q: What are the factors to be kept in view in dhyana?

Sri Ramana Maharshi :

It is important for one who is established in his Self [atmanishtha] to see that he does not swerve in the least from this absorption.

By swerving from his true nature he may see before him bright effulgences, or hear unusual sounds,
or regard as real the visions of gods appearing
within or outside himself.

He should not be deceived by these and forget himself.

~ From Be as you are book