1/11/2012

Pride gives Pain to Everyone

Pride gives Pain to Everyone

He who enjoys worldly pleasures, whether he does it with his own wealth, knowledge, power and does it lawfully, as prescribed in scriptures etc. , then too he gives pain (sorrow, displeasure) to others. If you take pleasure from a particular thing, then that thing has departed from someone or the other, due to which you have gained pleasure from it. The reason is that all favorable things in the world are finite and limited. One can even get displeasure from a saint-great soul, but it is of a different kind. Their spiritual joy cannot give sorrow to anyone, but seeing them joyful as per their nature, others become displeased. Therefore that pain and displeasure is due to the other person's nature. Saints- great souls do not become the cause in that sorrow. He who with his prudence and cleverness acquires worldly things and enjoys pleasures with it, he inevitably gives sorrow to others. A happy person filled with spiritual joy, does not give sorrow to others, but others become displeased. Just as Shivaling is for praying, but if someone uses it to break their head, then what is one to do? Therefore he who is happy due to worldly pleasures, gives displeasure (sorrow) to others.

This is a very deep subject that without giving sorrow, pleasures cannot ever be enjoyed. That enjoyment of pleasures makes someone or the other dependent. With the enjoyment of pleasures, the objects of enjoyment are destroyed and the enjoyer is also doomed. No one can be saved from this. Therefore any which way, indulging in pleasure is the road to hell.

The main point is what has been told previously. Pay attention to it. Worldly pleasures are limited and are the kind to come into being and later disappear. Everyone is trying to acquire those things that are limited (finite), therefore those things will with certainty be divided (shared). But spiritual joy is unlimited, therefore there is no division of it. All can get abundance of it. Just as a mother may have ten children, then too the mother is not divided among the ten. It is not that a certain portion of the mother is one child's, the remaining belongs to the other children. Mother belongs to every one of the children, completely and totally. Similarly, God is entirely and totally ours.

When desires are entirely eradicated then pride will be wiped out and when pride goes away completely, then desires too will come to an end. When these go away, the affinity with the inert (world) will be cut off and all pleasures and deficiencies will come to an end.

Narayana ! Narayana !! Narayana !!!

From book in hindi "Tattvik Pravachan" by Swami Ramsukhdasji

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Ram Ram

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1/10/2012

शिव मंत्र

 शिव  मंत्र 
(108 Names of Lord Siva)
ॐ  शिवाय  नमः !
ॐ  महेश्वराय  नमः !
ॐ शंभवे  नमः !
ॐ  पिनाकिने  नमः !
ॐ   शशिशेखराय   नमः ! 
ॐ  वामदेवाय  नमः !
ॐ  विरुपकक्षाय   नमः !
ॐ  कपार्दिने  नमः !
ॐ  निलालोहिताया  नमः 
ॐ  शंकराय  नमः 
ॐ  शुलापनाये  नमः !
ॐ  खट्वांगिने  नमः !
ॐ  विष्णुवल्लभाय नमः !
ॐ  शिपिविश्तया नमः !
ॐ  अम्बिकनाथाया  नमः !
ॐ  श्रीकांताय   नमः ! 
ॐ  भक्तावत्सलाय   नमः!
ॐ  भव्य  नमः !
ॐ  सर्वाय  नमः !
ॐ  त्रिलोकेशाय  नमः !
ॐ शीतकंठाय   नमः !
ॐ  शिवप्रियाय  नमः!
ॐ  उग्राय  नमः !
ॐ  कपालिने  नमः !
ॐ  कामारये  नमः ! 
ॐ  अंधकासुर  सुदनया    नमः !
ॐ  गंगाधराय  नमः !
ॐ  लालातक्षाय    नमः !
ॐ  कलाकालय  नमः !
ॐ  कृपानिधये  नमः !
ॐ  भीमाय  नमः ! 
ॐ  परशु   हस्तय  नमः !
ॐ  मृगपनाये नमः !
ॐ  जटाधाराय नमः !
ॐ  कैलासवासिने  नमः  !
ॐ  कावाचिने  नमः  !
ॐ  कठोराय  नमः !
ॐ  त्रिपुरंताकाया नमः !
ॐ  वृशंकाय  नमः  !
ॐ  वृशभारुधाया  नमः !
ॐ  भस्मोद्धुलिता  विग्रहाय  नमः !
ॐ  समप्रियाया  नमः !
ॐ  स्वरमयाय  नमः !
ॐ  त्रयीमूर्तये नमः !
ॐ  अनिश्वराया  नमः !
ॐ  सर्वज्ञाय  नमः 
ॐ  परमात्मने  नमः 
ॐ  सोमासुराग्नी  लोचानाया  नमः 
ॐ  हविषे  नमः !
ॐ   यग्यामयाय नमः !
ॐ  सोमाय  नमः 
ॐ  पंचावाक्त्राया  नमः 
ॐ   सदाशिवाय  नमः 
ॐ  विश्वेश्वराय  नमः 
ॐ  वीरभद्राय  नमः  !
ॐ  गणनाथाय  नमः 
ॐ  प्रजापतये  नमः 
ॐ  हिरान्यरेतासे  नमः 
ॐ  दुर्धर्षाय  नमः 
ॐ  गिरिशाय  नमः !
ॐ  गिरिशाय  नमः !
ॐ  अनघाय  नमः 
ॐ  बुजन्गभुशाने नमः 
ॐ भार्गाय  नमः
ॐ  गिरिधन्वने  नमः 
ॐ   गिरिप्रियाय  नमः  !
ॐ  कृत्तिवाससे  नमः !
ॐ  पुरारातये  नमः !
ॐ  भगवते  नमः  !
ॐ  प्रमाथाधिपाय नमः 
ॐ मृत्युंजय नमः !
ॐ  सुक्ष्मतानावे   नमः !
ॐ  जगद्व्यापिने  नमः 
ॐ  जगादगुरवे  नमः
ॐ  व्योमकेशाय  नमः 
ॐ   महासेनाजनाकाया  नमः
ॐ  चरुविक्रमाया  नमः
ॐ  रुद्राय  नमः
ॐ  भूतपतये  नमः
ॐ   स्थानवे   नमः  !
ॐ  अहिर्बुध्न्याय  नमः 
ॐ दिगम्बराय  नमः
ॐ अष्टमुर्तये    नमः
ॐ अनेकात्मने  नमः
ॐ सत्विकाया नमः
ॐ शुद्ध  विग्रहाय नमः
ॐ शाश्वताय  नमः 
ॐ खान्दपराशावे    नमः
ॐ अजय  नमः 
ॐ पापविमोचाकाय  नमः  
ॐ मृदय  नमः 
ॐ पशुपतये  नमः
ॐ देवाय  नमः!
ॐ महादेवाय  नमः
ॐ अव्ययाय  नमः 
ॐ हरये  नमः 
ॐ पशुदंताभिदे  नमः 
ॐ अव्यग्राय  नमः 
ॐ दक्शाध्वाराहराय नमः !
ॐ हराया  नमः  !
ॐ भगनेत्रभिदे  नमः 
ॐ अव्यक्ताय  नमः
ॐ सहस्राक्षाय  नमः
ॐ सहस्रपदे  नमः
ॐ अपवार्गाप्रदाय नमः 
ॐ अनंताय  नमः 
ॐ  तारकाय  नमः !
ॐ परमेश्वराय  नमः !

1/09/2012

108 गणेश मंत्र





108 गणेश  मंत्र 

1. ॐ   गजाननाय  नमः 
2. ॐ  गणध्यक्षाया  नमः
3. ॐ  विग्नराजय  नमः
4. ॐ    विनायकाय  नमः
5. ॐ  द्विमातुराया  नमः


6. ॐ  द्विमुखाया  नमः
7. ॐ  प्रमुखाया  नमः
8. ॐ   सुमुखाय  नमः
9. ॐ  कृतिने  नमः
10. ॐ  सुप्रदीपाया  नमः

11. ॐ  सुखनिधये  नमः
12. ॐ  सुराध्यक्षाय  नमः
13. ॐ  सुररिघ्नाया  नमः
14. ॐ  महागानापताये  नमः
15. ॐ  मान्याय  नमः

16. ॐ  महाकालाय  नमः
17. ॐ  महाबलाय  नमः
18. ॐ  हेरम्बाय  नमः
19. ॐ  लम्बजथाराया  नमः
20. ॐ  हस्वाग्रिवाया  नमः

21. ॐ  महोदराय  नमः
22. ॐ  मदोत्काताया  नमः
23. ॐ  महाविराया  नमः
24. ॐ  मंत्रीने  नमः
25. ॐ   मंगलास्वरुपाया  नमः

26. ॐ  प्रमोदाय  नमः
27. ॐ  प्रधामय  नमः
28. ॐ  प्रग्नाया   नमः
29. ॐ  विग्नगात्रिये  नमः
30. ॐ  विग्नहंतरे  नमः

31. ॐ  विश्वनेत्राया     नमः
32. ॐ  विरात्पताये  नमः
33. ॐ  श्रीपतये  नमः
34. ॐ  वक्पताये  नमः
35. ॐ  स्रुन्गारिने  नमः

36. ॐ  अश्रीतावात्सालय  नमः
37. ॐ  शिवप्रियाय  नमः
38. ॐ  शीघ्राकरिने  नमः
39. ॐ  सस्वताया  नमः
40. ॐ  बलाय  नमः

41. ॐ  बलोधिताया  नमः
42. ॐ  भवत्मजय  नमः
43. ॐ  पुरानापुरुशाया  नमः
44. ॐ  पुश्ने  नमः
45. ॐ  पुष्करोचिता  नाम्हाया 

46. ॐ  अग्रगंयाया  नमः
47. ॐ  अग्रपुज्याया  नमः
48. ॐ  अग्रगामिने  नमः
49. ॐ  मंत्रकृताये  नमः
50. ॐ  चमिकराप्रभय  नमः

51. ॐ  सर्वया   नमः
52. ॐ  सर्वोपस्याया  नमः
53. ॐ   सर्वकर्तरे  नमः
54. ॐ  सर्वनेत्राया  नमः
55. ॐ   सर्वसिद्धिप्रदाय   नमः

56. ॐ  सर्वसिद्दाये  नमः
57. ॐ  पंचाहस्ताया  नमः
58. ॐ  पर्वतिनादानाया  नमः
59. ॐ  प्रभवे  नमः
60. ॐ   कुमारगुरवे  नमः

61. ॐ  अक्षोभ्याय  नमः
62. ॐ  कुन्जरासुराभंजनाया  नमः
63. ॐ  प्रमोदाप्तानायानाया  नमः
64. ॐ  मोदकप्रिय  नमः
65. ॐ  कन्तिमाते  नमः

66. ॐ   ध्रुतिमाते   नमः 
67. ॐ  कामिने  नमः
68. ॐ  कविधाप्रियाया  नमः
69. ॐ  ब्रह्मचारिणे  नमः
70. ॐ  ब्रह्मरुपिने  नमः

71. ॐ  ब्रह्मविध्याधिपाया  नमः
72. ॐ  जिष्णवे  नमः
73. ॐ  विश्नुप्रियाया  नमः
74. ॐ  भक्ताजिविताया  नमः
75. ॐ  जितामंमाधाया   नमः

76. ॐ  इश्वार्यकरानाया  नमः
77. ॐ  जयसे  नमः
78. ॐ  यक्शाकिन्नेरासेविताया  नमः
79. ॐ  गंगंसुताया  नमः
80. ॐ  गणधिसाया  नमः

81. ॐ  गम्भिरानिनादय  नमः
82. ॐ  वाटवे  नमः
83. ॐ  अभिश्तावारादय  नमः
84. ॐ  ज्योतिषे  नमः
85. ॐ  भ्क्तानिधाये  नमः

86. ॐ  भवगाम्याया  नमः
87. ॐ  मंगलाप्रदय  नमः
88. ॐ  अव्यक्ताय  नमः
89. ॐ  अप्रक्रुतापराक्रमाया  नमः
90. ॐ  सत्याधार्मिने  नमः

91. ॐ  सख्ये  नमः
92. ॐ  सरसंभुनिधाये  नमः
93. ॐ  महेसाया  नमः
94. ॐ  दिव्यन्गाया  नमः
95. ॐ  मनिकिन्किनिमेखालय   नमः

96. ॐ  समस्तादिवाताया  नमः
97. ॐ  सहिष्णवे  नमः
98. ॐ  सतातोद्दीताया  नमः
99. ॐ  विघताकरिने  नमः
100. ॐ  विस्वदृशे  नमः

101. ॐ  विस्वराक्षक्रुते  नमः
102. ॐ  कल्यानागुरावे  नमः
103. ॐ  उन्मात्तावेशाया  नमः
104. ॐ  अवराजजिते  नमः
105. ॐ   सम्स्ताजगढ़ाधाराया  नमः

106. ॐ  सर्वैश्वर्याया  नमः
107. ॐ  अक्रन्ताचिदाक्चुत्प्रभावे  नमः
108. ॐ  श्री  विग्नेस्वराया  नमः

12/25/2011

श्री गणपती अथर्वशीर्ष !!

 श्री गणपती अथर्वशीर्ष
हरिः ॐ नमस्ते गणपतये॥ त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमासि॥ त्वमेव केवलं कर्तासि॥
त्वमेव केवलं धर्तासि॥ त्वमेव केवलं हर्तासि॥ त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि॥
त्वं साक्षादात्मासि नित्यं ॥ १॥
ऋतं वच्मि॥ सत्यं वच्मि॥ २॥
अव त्वं माम्॥ अव वक्तारम्॥ अव श्रोतारम्॥ अव दातारम्॥ 
अव धातारम्॥ अवानूचानमव शिष्यम्॥ अव पश्चात्तात्॥ अव पुरस्तात्॥ 
अवोत्तरात्तात्॥ अव दक्षिणात्तात्॥ अव चोर्ध्वात्तात्॥ 
अवाधरात्तात्॥ सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात्॥ ३॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः॥ त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः॥
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि॥ त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि॥ त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥ ४॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति॥ 
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति॥ सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति॥ 
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि।।५॥
त्वं गुणत्रयातीतः त्वं देहत्रयातीतः॥ त्वं कालत्रयातीतः त्वं मूलाधारास्थितोऽसि नित्यम्॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥ त्वां योगिनोध्यायंति नित्यम्॥
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वंमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम्॥ ६॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्॥ अनुस्वारः परतरः॥
अर्धेन्दुलसितं॥ तारेण ऋद्धं॥ एतत्तव मनुस्वरूपम्॥ 
गकारः पूर्वरूपम्॥ अकारो मध्यमरूपम्॥ अनुस्वारश्चांत्यरूपम्॥ 
बिन्दुरुत्तररूपम्॥ नादः संधानम्॥ संहिता संधिः॥ सैषा गणेशविद्या॥
गणक ऋषिः॥ निचृद्गागायत्रीच्छंदः॥ गणपतिर्देवता॥ ॐ गं गणपतये नमः॥ ७॥
एकदंताय विघ्नहे वक्रतुण्डाय धीमहि॥ तन्नो दंतिः प्रचोदयात्॥ ८॥
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणाम॥ रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्॥ रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥ 
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्॥आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥ ९॥
नमोत्रातपतये। नमो गणपतये। नमः प्रमथपतये। 
नमस्ते अस्तु लंबोदरायैकदंताय विघ्नानाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नमः॥१०॥
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते॥ स ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
स सर्वविघ्नैर्नबाध्यते॥ स सर्वत: सुखमेधते । स पंचमहापापात्प्रमुच्यते॥
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति॥
सायं प्रातः प्रयुंजानो अपापो या भवति॥सर्वत्राधीनोऽपविघ्नो भवति॥ 
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति॥ इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयं ॥ 
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥ ।
अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति॥ 
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति। इत्यथर्वणवाक्यम्॥ 
ब्रह्मद्यावरणं विद्यात् । न बिभेति कदाचनेति॥
यो दूर्वांकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति॥
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति स मेधावान् भवति॥ 
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति॥
यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति॥ 
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति॥ 
महाविघ्नात्प्रमुच्यते॥ महादोषात्प्रमुच्यते॥ महापापात् प्रमुच्यते॥ 
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति॥ य एवं वेद इत्युपनिषत्॥ १४॥
ॐ सहनाववतु॥ सहनौभुनक्तु॥ सह वीर्यं करवावहै॥
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति॒: । शांति॒:॥ शांति॑:॥
॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम्॥

12/24/2011

श्रीगणेशाची आरती

श्रीगणेशाची आरती

सुखकर्ता दु:खहर्ता वार्ता विघ्नाची।।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।।
सर्वांगीं सुंदर उटि शेंदुराची।।
कंठीं झळके माळ मुक्ताफळांची।। १ ।।

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ओ श्रीमंगलमूर्ती।।
दर्शनमात्रें स्मरनेमात्रें मनकामना पुरती ।। धृ.।।

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।।
हिरेजडित मुगुट शोभतो बरा।।
रुणझुणती नूपुरें चरणीं घागरिया।। जय.।। २ ।।

लंबोदर पितांबर फणिवरबंधना।।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।।
संकष्टीं पावावें निर्वाणीं रक्षावें सुरवरवंदना।।
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ओ श्रीमंगलमूर्ती ।। दर्शन.।। ३ ।।

12/23/2011

गीता सार

गीता - सार

“खाली हाथ आए और खाली हाथ चले।
जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का

था, परसों किसी और का होगा।
इसिलिए, जो कुछ भी तू करता है,
... उसे भगवान के अर्पण करता चल।“

क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो?
किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें
मार सक्ता है? आत्मा ना पैदा होती
है, न मरती है।

जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा
है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा,
वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का
पश्चाताप न करो। भविष्य की
चिन्ता न करो। वर्तमान चल
रहा है।

तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो?
तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो
दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो

नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए
जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर
दिया। जो लिया, इसि (भगवान) से लिया। जो
दिया, इसि को दिया।
खाली हाथ आए और खाली हाथ चले।

जो आज तुम्हारा है, कल और
किसी का था, परसों किसी और
का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो
रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का
कारण है।परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे

तुम मृत्यु समझते हो, वही तो
जीवन है। एक क्षण में तुम करोडों के
स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही
क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा,
छोटा-बडा, अपना-पराया, मन से मिटा दो,
फिर सब तुम्हारा
है। तुम सबके हो।

न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम
शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु,
पृथ्वी, आकाश से बना है और
इसि में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा

स्थिर है – फिर तुम क्या हो?
तुम अपने आपको भगवान

के अर्पित करो। यही सबसे
उत्तम सहारा है।

जो इसके सहारे को जानता है वह
भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
जो कुछ भी तू करता है,
उसे भगवान के अर्पण
करता चल।

ऐसा करने से सदा जीवन – मुक्त
का आनंन्द अनुभव करेगा।

12/22/2011

हनुमान चालीसा

हनुमान  चालीसा
(Hanuman Chalisa)
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित
दोहा
श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि
बरनउ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार

चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥

शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥

विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मनबसिया॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥

लाय सजीवन लखन जियाए
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥

आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥

भूत पिशाच निकट नहि आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥

नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥

संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥

चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥

साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥

तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥

अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥

और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥

संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥

जै जै जै हनुमान गुसाईँ
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥

दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥